नाथ संप्रदाय -चार /उलट बांसियां
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नाथ बोलै अमृत बांणी,बरसैगी कंबली भीजेगा पाणी।
गाड़ि पडरवा बांधिलै खूंटा,चले दमामा बाजिलै ऊंटा।
ढूकिलै कूकर भूकिले चोर,काढे धणी पुकारै डोर।
ऊजड़ खेड़ा नगर मझारी,तलि गागरि ऊपर पणिहारी।
मगरी परि चूल्हा धूंधाई,पौंवणहारा कूं रोटी खाई।
कामिनी जलै अंगीठी तापे,बीची बैसंदर थरहर कांपे।
एक जू रढिया रढती आई,बहू बिवाई सासू जाई।
नगरी को पांणी कूई में आवे,उटती चरचा गोरग गावे।।
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